<?xml version="1.0"?>
<feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xml:lang="en">
	<id>https://iks.bhu.edu.in/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=Sbg_10.13_scram</id>
	<title>Sbg 10.13 scram - Revision history</title>
	<link rel="self" type="application/atom+xml" href="https://iks.bhu.edu.in/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=Sbg_10.13_scram"/>
	<link rel="alternate" type="text/html" href="https://iks.bhu.edu.in/index.php?title=Sbg_10.13_scram&amp;action=history"/>
	<updated>2026-04-07T18:49:58Z</updated>
	<subtitle>Revision history for this page on the wiki</subtitle>
	<generator>MediaWiki 1.44.3</generator>
	<entry>
		<id>https://iks.bhu.edu.in/index.php?title=Sbg_10.13_scram&amp;diff=13085&amp;oldid=prev</id>
		<title>imported&gt;Vij: Added {content_identifier} content</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://iks.bhu.edu.in/index.php?title=Sbg_10.13_scram&amp;diff=13085&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2025-12-04T07:42:17Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Added {content_identifier} content&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja&lt;br /&gt;
।।10.13।।अर्जुन उवाच --&lt;br /&gt;
परं ब्रह्म&lt;br /&gt;
परं धाम परमं पवित्रम् इति यं श्रुतयो वदन्ति स हि&lt;br /&gt;
भवान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते? येन जातानि जीवन्ति? यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति? तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्मेति (तै0 उ&lt;br /&gt;
0&lt;br /&gt;
3।1)ब्रह्मविदाप्नोति परम् (तै0 उ&lt;br /&gt;
0&lt;br /&gt;
2।1)स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति (मु0 उ&lt;br /&gt;
0&lt;br /&gt;
3।2।9) इति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथा&lt;br /&gt;
परं धाम&lt;br /&gt;
धामशब्दो ज्योतिर्वचनः परं ज्योतिःअथ यदतः परो दिव्यो ज्योतिर्दीप्यते (छा0 उ&lt;br /&gt;
0&lt;br /&gt;
3।13।7)परं ज्योतिरूपसंपद्यस्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते (छा0 उ&lt;br /&gt;
0&lt;br /&gt;
8।12।2)तद् देवा ज्योतिषां ज्योतिः (बृ0 उ&lt;br /&gt;
0&lt;br /&gt;
4।4।16) इति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथा च&lt;br /&gt;
परमं पवित्रं&lt;br /&gt;
परमं पावनं स्मर्तुःअशेषकल्मषाश्लेषकरं विनाशकरं च।यथा पुष्करपलाश आपो न श्िलष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्िलष्यते (छा0 उ&lt;br /&gt;
0&lt;br /&gt;
4।14।3)तद्यथेषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैव्ँहास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते (छा0 उ&lt;br /&gt;
0&lt;br /&gt;
5।24।3)।नारायणः परं ब्रह्म तत्त्वं नारायणः परः। नारायणः परं ज्योतिरात्मा नारायणः परः।। (महाभा0 9।4) इति हि श्रुतयो वदन्ति।&lt;br /&gt;
ऋषयः च सर्वे&lt;br /&gt;
परावरतत्त्वयाथात्म्यविदः&lt;br /&gt;
त्वाम्&lt;br /&gt;
एव&lt;br /&gt;
शाश्वतं दिव्यं पुरुषम् आदिदेवम् अजं विभुम् आहुः। तथा एव देवर्षिः नारदः असितो देवलो व्यासः च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एष नारायणः श्रीमान् क्षीरार्णवनिकेतनः। नागपर्यङ्कमुत्सृज्य ह्यागतो मथुरां पुरीम्।।पुण्या द्वारवती तत्र यत्रास्ते मधुसूदनः। साक्षाद्देवः पुराणोऽसौ स हि धर्मः सनातनः।।ये च वेदविदो विप्रा चे चाध्यात्मविदो जनाः। ते वदन्ति महात्मानं कृष्णं धर्मं सनातनम्।।पवित्राणां हि गोविन्दः पवित्रं परमुच्यते। पुण्यानामपि पुण्योऽसौ मङ्गलानां च मङ्गलम्।।त्रैलोक्ये पुण्डरीकाक्षो देवदेवः सनातनः। आस्ते हरिरचिन्त्यात्मा तत्रैव मधुसूदनः।। (महा0 वन0 88।2428) तथायत्र नारायणो देवः परमात्मा सनातनः। तत्र कृत्स्नं जगत्पार्थ तीर्थान्यायतनानि च।।तत्पुण्यं तत्परं ब्रह्म तत्तीर्थं तत्तपोवनम्। ৷৷. तत्र देवर्षयः सिद्धाः सर्वे चैव तपोधनाः।।आदिदेवो महायोगी यत्रास्ते मधुसूदनः। पुण्यानामपि तत्पुण्यं माभूत्ते संशयोऽत्र वै।। (महा0 वन0 90।2832)कृष्ण एव हि लोकानामुत्पत्तिरपि चाप्ययः। कृष्णस्य हि कृते भूतमिदं विश्वं चराचरम्।। (महा0 सभा0 38।23) इति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथा स्वयम् एव ब्रवीषि चभूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।। (गीता 7।4) इत्यादिना?अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते (गीता 10।8) इत्यन्तेन।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;Vij</name></author>
	</entry>
</feed>